




सुप्रतिष्ठित कथाकार, शिक्षाविद् तथा विचारक जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ के रचनात्मक योगदान और स्मृति को समर्पित वनमाली सृजन पीठ एक साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा रचनाधर्मी अनुष्ठान है, जो परंपरा तथा आधुनिक आग्रहों के बीच संवाद तैयार करने सतत सक्रिय है। साहित्य तथा कलाओं की विभिन्न विधाओं में हो रही सर्जना को प्रस्तुत करने के साथ ही उसके प्रति लोकरुचि का सम्मानजनक परिवेश निर्मित करना भी पीठ की प्रवृत्तियों में शामिल है। इस आकांक्षा के चलते रचनाधर्मियों से संवाद और विमर्श के सत्रों के अलावा यह सृजन पीठ शोध, अन्वेषण, अध्ययन तथा लेखन के लिए नवोन्मेषी प्रयासों तथा सृजनशील प्रतिभाओं को चिन्हित करने और उन्हें अभिव्यक्ति के यथासंभव अवसर उपलब्ध कराने का काम भी करती है। बहुलता का आदर और समावेशी रचनात्मक आचरण हमारी गतिशीलता के अभीष्ट हैं।


चालीस से साठ के दशक के बीच वनमाली जी हिंदी के कथा जगत के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। 1934 में उनकी पहली कहानी ‘जिल्दसाज’ कलकत्ते से निकलने वाले ‘विश्वमित्र’ मासिक में छपी और उसके बाद लगभग पच्चीस वर्षों तक वे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं — सरस्वती, कहानी, विश्वमित्र, विशाल भारत, लोकमित्र, भारती, माया, माधुरी आदि — में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे।
अनुभूति की तीव्रता, कहानी में नाटकीय प्रभाव, सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक समझ और विश्लेषण की क्षमता के कारण उनकी कहानियों को व्यापक पाठक वर्ग और आलोचकों दोनों से सराहना प्राप्त हुई।
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने अपने श्रेष्ठ कहानियों के संकलन में उनकी कहानी ‘आदमी और कुत्ता’ को स्थान दिया था। करीब बीस वर्षों तक मध्य प्रदेश के अनेक विद्यालयों और महाविद्यालयों में वनमाली जी की कहानियाँ पढ़ाई जाती रहीं। उन्होंने लगभग सौ से अधिक कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं निबंध लिखे। कथा साहित्य के अलावा उनके व्यंग्य निबंध भी विशेष रूप से चर्चित रहे। आकाशवाणी इंदौर से उनकी कहानियाँ नियमित रूप से प्रसारित होती रहीं।
कथा साहित्य के अतिरिक्त वनमाली जी का शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान रहा। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के अग्रणी शिक्षाविदों में थे। गांधी जी के आह्वान पर कई वर्षों तक प्रौढ़ शिक्षा के कार्य में लगे रहे। तत्पश्चात शिक्षक, प्रधानाध्यापक एवं उपसंचालक के रूप में उन्होंने बिलासपुर, खंडवा और भोपाल में कार्य किया। उनकी पुस्तकों के माध्यम से शालाओं और शिक्षण विधियों में नवाचार हुआ। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद की समिति के सदस्य के रूप में भी उन्होंने शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। 1962 में डॉ. राधाकृष्णन के हाथों उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
वनमाली जी का जन्म 1 अगस्त 1912 को आगरा में हुआ। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित) में व्यतीत किया और 30 अप्रैल 1976 को भोपाल में उनका निधन हुआ। उनका पहला कथा संग्रह ‘जिल्दसाज’ उनकी मृत्यु के बाद 1983 में प्रकाशित हुआ तथा ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ नाम से दूसरा संग्रह 1995 में प्रकाशित हुआ।
वर्ष 2009 में ‘वनमाली समग्र’ का पहला खंड तथा वर्ष 2014 में संतोष चौबे के संपादन में ‘वनमाली स्मृति’ तथा ‘वनमाली सृजन’ शीर्षक से दो खंड प्रकाशित हुए। हाल के वर्षों में दस कहानियाँ, वनमाली जी की संपूर्ण कहानियाँ, कला का आदर्श, कुछ निबंध कुछ पत्र, वनमाली : एक कृतित्व-व्यक्तित्व, दस युवा आलोचकों की दृष्टि में वनमाली जैसी वनमाली केंद्रित पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ है। ‘जिल्दसाज’, ‘रेल का डिब्बा’, ‘मांझी’ जैसी कई कहानियों का नाट्य मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक देवेंद्रराज अंकुर एवं अन्य ख्यात निर्देशकों जैसे संजय मेहता, मनोज नायर द्वारा देश के विभिन्न स्थानों पर किया गया है।